शिशुनाग वंश का इतिहास(412 ई.पू.- 344 ई.पू.) ~ Ancient India

शिशुनाग वंश का इतिहास(412 ई.पू.- 344 ई.पू.)

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हर्यक वंश का अंतिम राजा नागदशक था, जिसे शिशुनाग ने अपदस्थ कर दिया और शिशुनाग वंश की स्थापना की। 


शिशुनाग

शिशुनाग 412 ई॰पू॰ गद्दी पर बैठा ।महावंश के अनुसार शिशुनाग लिच्छवि राजा के वेश्या पत्‍नी से उत्पन्‍न पुत्र था। पुराणों के अनुसार वह क्षत्रिय था। इसने सर्वप्रथम मगध के प्रबल प्रतिद्वन्दी राज्य अवन्ति पर वहां के शासक अवंतिवर्द्धन के विरुद्ध विजय प्राप्त की और उसे अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। इस प्रकार मगध की सीमा पश्‍चिम मालवा तक फैल गई। तदुपरान्त उसने वत्स को मगध में मिलाया। वत्स और अवन्ति के मगध में विलय से, पाटलिपुत्र के लिए पश्‍चिमी देशों से, व्यापारिक मार्ग के लिए रास्ता खुल गया।
शिशुनाग ने मगध से बंगाल की सीमा से मालवा तक विशाल भू-भाग पर अधिकार कर लिया।
शिशुनाग एक शक्‍तिशाली शासक था जिसने गिरिव्रज के अलावा वैशाली नगर को भी अपनी राजधानी बनाया। 314ई. पू. में इसकी मृत्यु हो गई।


कालाशोक


यह शिशुनाग का पुत्र था जो शिशुनाग के 314 ई. पू. मृत्यु के बाद मगध का शासक बना। महावंश में इसे कालाशोक तथा पुराणों में काकवर्ण कहा गया है। इसने 28 वर्षों तक शासन किया। कालाशोक के काल को प्रमुखत: दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं के लिए जाना जाता है- वैशाली में दूसरी 'बौद्ध परिषद' की बैठक और पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में मगध की राजधानी का स्थानान्तरण।

बाणभट्ट रचित हर्षचरित के अनुसार काकवर्ण को राजधानी पाटलिपुत्र में घूमते समय महापद्यनन्द नामक व्यक्‍ति ने चाकू मारकर हत्या कर दी थी। 366 ई. पू. कालाशोक की मृत्यु हो गई।
महाबोधिवंश के अनुसार कालाशोक के दस पुत्र थे, जिन्होंने मगध पर 22 वर्षों तक शासन किया।जिसमे सर्वप्रमुख था: महानन्दिन (नन्दिवर्धन)।


महानन्दिन


महानन्दिन के शाशनकाल में कोई उल्लेखनीय घटना नहीं घटी ।
महानन्दिन शिशुनाग वंश का अंतिम शासक साबित हुआ। महापद्म ने शिशुनाग वंश को उखाड़ फेंका ओर एक नए राजवंश की स्थापना की जो ,नंदवंश के नाम से जाना गया।
इस प्रकार 344 ई. पू. में शिशुनाग वंश का अन्त हो गया और नन्द वंश का उदय हुआ।
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