Nirankari mission kya hai~ निरंकारी मिशन का इतिहास ~ Ancient India

Nirankari mission kya hai~ निरंकारी मिशन का इतिहास

एक ऐसा मिशन जो हमेशा मानवता की सेवा में तत्पर रहा है । जिसने सम्पूर्ण मानव जाति को सच्चाई व परोपकार का पाठ पढ़ाया । जिसने ऊंच-नीच, धर्म-जाती के भेद को दूर कर सबके एक ही परमात्मा की संतान होने की सीख दी । आज दशकों बाद अपने उपर हुए अनेकों अत्याचारों के बावजूद भी पूरी दुनिया को शांति, अहिंसा व भाईचारे का संदेश दे रहा है । दोस्तों इस मिशन का नाम है सन्त निरंकारी मिशन ।

बाबा हरदेव सिंह

25 मई 1929 को बाबा बूटा सिंह ने पेशावर (पाकिस्तान) में निरंकारी मिशन की नींव रखी । दोस्तों निरंकारी मिशन कोई धर्म या धार्मिक संस्था नहीं है बल्कि यह एक आध्यात्मिक विचारधारा है । या यूं कहें कि यह एक मिशन है जिसने सच्चे मन से मानवता की सेवा का संकल्प लिया है । यह विचारधारा सभी धर्मों का सम्मान करती है । इनका मानना है कि सभी धर्म समान है तथा सभी धर्मों को मानने वाले एक ही परमात्मा की संतान हैं । चाहे कोई भी धर्म हो हमें आपस में वैर-वैमनस्य रखना नहीं सिखाता बल्कि धर्म इंसान को इंसान से जोड़ने का कार्य करता है । इनका मानना है कि निरंकार (परमात्मा) सर्वत्र व्याप्त है । कण-कण में परमात्मा की दिव्य ज्योति है । परमात्मा निराकार है (जिसका कोई आकार ना हो)। अमर अजर अविनाशी है । परमात्मा सत्कर्मों में है । यदि मनुष्य आपसी वैमनस्य को दूर कर सत्कर्म करता रहे तो उसके जीवन का सास्वत सार्थक उद्देश्य सिद्ध हो जाता है ।

आज विश्व के लगभग 27 देशों में इस मिशन की 3000 शाखाएँ व एक करोड़ से भी अधिक अनुयायी हैं । निरंकारी मिशन के अनुयायी एक साधा व सादगी भरा जीवन जीते हैं । ये दिखावे व झूठी शान-शौकत से दूर रहते हैं । ये साधा भोजन खाते हैं । सच्चाई व गुरु के आदेशों का पालन इनके जीवन का मूल मंत्र है । निरंकारी समाज सेवा में सबसे आगे रहते हैं । ये समाज में फैली कुरीतियों से दूर रहते हैं व अपने बच्चों को भी इन कुरूतियों से दूर रहने की शिक्षा देते हैं ।

कौन हैं निरंकारी

हालांकि शुरूआत में ऐसा माना जाता था कि निरंकारी लोग सिख हैं लेकिन ऐसा नहीं था । निरंकारी मिशन व सिख धर्म दोनों की विचारधाराऐं अलग-अलग हैं । ठीक उसी तरह जिस तरह मुस्लिम समुदाय अलग-अलग विचारधारा के कारण शिया व सुन्नी में बंटा है, ईसाई समुदाय कैथोलिक व प्रोटेस्टेंट में, जैन समुदाय श्वेतांबर व दिगंबर में, हिन्दू सम्प्रदाय शैव व वैष्णव में में बंटा है । ठीक कुछ ऐसी ही स्थिति सिख समुदाय की कही जा सकती है । सिख धर्म के अनुयायी गुरु गोबिंद साहिब के बाद गुरु ग्रंथ साहिब को ही अपना गुरु मानते हैं । लेकिन निरंकारी मिशन में एक जीवित व्यक्ति को गुरुपद दिया जाता है । हालांकि शुरुआत में इस पर कोई विवाद नहीं था और ना ही निरंकारी मिशन ने कभी ऐसा दावा किया कि, निरंकारी मिशन सिख धर्म की शाखा है जिसका यह परिवर्तित व संशोधित संस्करण है । लेकिन कुछ संकुचित मानसिकता वाले लोगों निरंकारी मिशन को सिख धर्म की खिलाफत में खड़ी विचारधारा समझ लिया ।

निरंकारी मिशन के प्रमुख गुरु

बाबा बूटा सिंह का जन्म जिला कैमलपुर के गांव हदवाल (वर्तमान पाकिस्तान में) में 1873 ई. में हुआ । इनके पिता का नाम सरदार बिशन सिंह तथा माता का नाम मायावन्ति था । बाबा बूटा सिंह बचपन से ही आध्यत्मिक ज्ञान प्राप्त करने के तीव्र जिज्ञासु थे । वे अपना ज्यादातर समय साधु-संतों की संगत तथा प्रभु के भजन सिमरण एवं धार्मिक सद्ग्रन्थों के पठन-पाठन में बिताया करते थे ।

उन्हें हिंदी ,अंग्रेजी, पंजाबी, उर्दू व फारसी भाषा का भली भांति ज्ञान था । बाबा बूटा सिंह ने कुछ दिनों तक फौज में भी नौकरी की लेकिन बाद में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी तथा अपने व परिवार के जीवनयापन के लिए हाथों व बाजुओं पर नाम व चित्र गोदने का कार्य करने लगे । इस प्रकार उन्हें निर्गुण निराकार परमात्मा का ध्यान व प्रचार करने का समय मिल जाया करता था । 18 वर्ष की आयु में सतगुरू बाबा बूटा सिंह का विवाह सरदार आशा सिंह जग्गी की सुपुत्री लाजवंती जी से हुआ लेकिन प्लेग जैसी भयानक बीमारी के कारण 1904 ई. में उनका निधन हो गया । उनकी दूसरी शादी मतावन्ति जी से हुई । लेकिन दोनों पत्नियों से उन्हें कोई संतान प्राप्त नहीं हुई ।

सतगुरू बाबा काहन सिंह जी ने उन्हें निज स्वरूप आत्मा का बोध तथा निर्गुण-निराकार परमात्मा का दर्शन व दीदार कराया । ज्ञान प्राप्ति के बाद बाबा बूटा सिंह को अपने औेर परमात्मा के बीच भेद समझ आ गया और अपने जीते जी निर्गुण-निराकार परमात्मा को जानकर और पहचानकर वह धन्य हो गये। आत्मबोध होने के बाद बाबा जी ने अपना सारा जीवन इस अमोलक ज्ञान को जन-जन तक पंहुचाने में लगा दिया ।

सतगुरु बाबा बूटा सिंह के दो प्रिय शिष्य थे बाबा महताब सिंह व बाबा अवतार सिंह । 25 मई 1929 ई. में बाबा अवतार सिंह को बाबा बूटा सिंह से ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ था बस तभी से निरंकारी मिशन की शुरुआत मानी जाती है । बाबा बूटा सिंह ने बाबा अवतार सिंह व बाबा महताब सिंह को अंतिम उपदेश दिया तथा इस अमोलक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का आदेश दिया । 70 वर्ष की आयु में 1943 ई. में बाबा बूटा सिंह ब्रह्मलीन हो गए । इसके पश्चात संत निरंकारी मिशन की बागडोर बाबा अवतार सिंह ने संभाली । बाबा बूटा सिंह ने इस ज्ञान के प्रचार प्रसार का केंद्र राजधानी दिल्ली को बनाया वहीं बाबा महताब सिंह ने निराकारी जाग्रति मिशन के माध्यम से बाबा बूटा सिंह के ज्ञान का प्रचार किया जिसका केंद्र कानपुर(उ.प्र.) था ।

सतगुरु बाबा अवतार सिंह

सतगुरु बाबा अवतार सिंह जी का जन्म गांव लतिफल, जिला झेलम (पंजाब, पाकिस्तान) में 31 दिसम्बर,1899 को हुआ था । इनके पिता का नाम श्री मुख सिंह तथा माता का नाम श्रीमती नारायणी देवी था । बाबा अवतार की पत्नी माता बुध्वंती जी थीं तथा गुरुबचन सिंह इनके बेटे थे जो इनके पश्चात सतगुरु का पद संभालते हैं ।

सतगुरु बाबा अवतार सिंह के जीवन की सबसे प्रमुख घटना 1929 ई. में उनकी बाबा बूटा सिंह से मुलाकात थी । बाबा बूटा सिंह से ही उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ । तभी से यह संत निरंकारी मिशन की शुरुआत होती है । सन्न 1943 में बाबा बूटा सिंह के निधन के पश्चात बाबा अवतार सिंह ने सतगुरु का पद संभाला । भारत विभाजन के बाद 1948 में संत निरंकारी मिशन की गतिविधियों को नियंत्रित रखने के लिए संत निरंकारी मंडल की स्थापना की गई जिसका मुख्यालय पहाड़गंज, दिल्ली में बनाया गया ।

संत निरंकारी मंडल द्वारा हर वर्ष 3-5 दिवसीय समागम का आयोजन किया जाता है जिसमें देश-विदेश से लाखों लोग सम्मलित होते हैं । समागमों के आयोजन की शुरुआत सन्न 1948 में हुई थी । 29 अगस्त 1948 को बाबा अवतार सिंह के बेटे सज्जन सिंह का निधन हो गया जिनकी याद में दिल्ली के सदर में 26 सितंबर 1948 श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया गया । इस समारोह में देश के विभिन्न क्षेत्रों से सैंकड़ो महापुरुषों ने भाग लिया । यह निरंकारियों का पहला समागम माना जाता है ।

जनमानस तक निरंकारी मिशन का संदेश पहुंचाने के उद्देश्य से बाबा अवतार सिंह द्वारा अवतार वाणी नामक एक पुस्तक की रचना की गई । इसका प्रारंभिक संस्करण 1957 में प्रकाशित हुआ जबकि इसका पूर्ण संस्करण (सम्पूर्ण अवतार वाणी) 1965 में प्रकाशित हुआ । हालांकि इस पुस्तक को निरंकारियों के लिए पवित्र पुस्तक मानने के प्रति कट्टरता नहीं है । यह किताब मूल रूप में पंजाबी भाषा में लिखी गई थी, जबकी इसके कुछ श्लोक सिंधी भाषा में हैं ।

धीरे-धीरे निरंकारी मिशन के संगठन का ओर विस्तार हुआ व भक्तों की संख्या बढ़ती गई । व्यवस्था को बनाये रखने के लिए 1956 में सेवादल की स्थापना की गई ।

5 नवंबर 1963 को 16वां संत निरंकारी समागम का आयोजन किया गया । इसी दौरान निरंकारी बाबा अवतार सिंह ने गुरू का पद त्याग दिया तथा बाबा गुरुबचन सिंह को गुरु की गद्दी प्रदान की । बाबा गुरुबचन सिंह स्वंय 6 वर्षों तक एक आम निरंकारी बनकर रहे । सन्न 1964 में बाबा अवतार सिंह की पत्नी जगत माता बुद्धवन्ति का निधन हो गया तथा 17 सितम्बर 1969 को बाबा ने भी अपना नश्वर शरीर त्याग दिया । अतः इस प्रकार मिशन की पूरी जिम्मेदारी बाबा गुरुबचन सिंह पर आ गई ।

बाबा गुरुबचन सिंह

बाबा गुरुबचन सिंह का जन्म 10 दिसम्बर 1930 ई. को पेशावर (पाकिस्तान) में हुआ । बाबा गुरुबचन सिंह बाबा अवतार सिंह व माता बुद्धवन्ति की संतान थे । पेशावर में ही इन्होंने एक स्कूल से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की लेकिन बाद में इन्होंने रावलपिंडी के खालसा स्कूल से मेट्रिक की परीक्षा पास की ।

22 अप्रैल 1947 को बाबा का विवाह मन्ना सिंह की पुत्री कुलवंत कौर से हुआ । बंटवारे के बाद बाबा गुरुबचन सिंह भारत आ गए । यहां उन्होंने अपने पिता बाबा अवतार सिंह के साथ सत्संग व प्रचार यात्राओं में भाग लिया । 5 नवंबर 1963 को बाबा गुरुबचन को निरंकारी मिशन की गद्दी सौंपी गई । बाबा गुरुबचन ने पूरे जीजान मिशन की सेवा की तथा देश भर में निरंकारी मिशन का प्रचार-प्रसार किया । उन्होंने देश भर में सत्संगों को सुचारू रूप में सम्पन्न कराने के लिए भवनों का निर्माण कराया ।

1965 में मसूरी तथा 1973 में लुधियाना में आयोजित सम्मेलनों में निरंकारी मिशन की प्रगति के लिए कई बड़े और दूरगामी निर्णय लिए गए । देशव्यापी प्रचार को गति देने के लिए बाबाजी ने उपलब्ध साधनों का सर्वोत्तम उपयोग किया । आपने अनुयायियों द्वारा भेंट दिए गए एक-एक पैसे को मिशन के प्रचार-प्रसार, भवन निर्माण, वाहन व मिशन की अन्य जरूरतों में लगाया । बाबाजी ने पुरानी कारों को ठीक कर उन्हें प्रचार व सत्संग के कार्यों में उपयोग लिया । जिससे मिशन की प्रगति में सहायता मिली । इतना ही नहीं 1967 ई. में बाबा जी ने सड़क मार्ग से ब्रिटेन की यात्रा की । वे दहेज-प्रथा जैसी सामाजिक कुरुति के विरोधी थे तथा नशे से हमेशा दूर रहने का सबसे आग्रह किया । बाबाजी ने विवाह-शादियों में व्यर्थ खर्चे, झूठी शान-शौकत व आडम्बरों का हमेशा विरोध किया । इस प्रकार बाबा गुरुबचन सिंह ने निरंकारी मिशन की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया । जैसे-जैसे निरंकारी मिशन परवान चढ़ता गया वैसे-वैसे चरमपंथियों की परेशानियां बढ़ती गई । बाबा गुरुबचन सिंह पर कई बार जानलेवा हमले हुए । उत्तर प्रदेश के कानपुर व तत्कालीन मध्य प्रदेश के दुर्ग में बाबा गुरुबचन सिंह पर हमला हुआ । लेकिन दोनों ही हमलों में बाबा गुरुबचन सिंह बच गए । 13 अप्रैल 1978 को अमृतसर में सिखों (अकाली दल सदस्य) व निरंकारियों के मध्य हिंसक झड़प हुई । लगभग 200 की संख्या में चरमपंथी सिख निरंकारियों पर टूट पड़े । फौजा सिंह नामक एक सिख ने तलवार से बाबा गुरुबचन सिंह पर हमला करने की कोशिश की लेकिन बाबाजी की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मी ने फौजा सिंह को गोली मार दी । मौके पर पहुंची पुलिस ने चरमपंथियों को खदेड़ने के लिए गोलियां चलाईं । इस पूरे घटनाक्रम में 12 सिख व 4 निरंकारी मारे गए । इस घटना के बाद बाबा गुरुबचन सिंह पर पुलिस ने केश दर्ज किया । करनाल कोर्ट का फैसला आया जिसमें गुरुबचन सिंह को बाईज्जत बरी कर दिया । कोर्ट ने कहा कि गुरुबचन सिंह के सुरक्षागार्ड ने आत्मरक्षा के लिए गोली चलाई थी । इस घटना के साथ ही पंजाब में उग्रवाद की शुरुआत हो चुकी थी । सिखों का धार्मिक नेता संत जरनैल सिंह भिंडरावाले (अध्यक्ष दमदमी टकसाल) था जो पंजाब में उग्रवाद व आतंक का पर्याय बन चुका था । जिसने सिखों को केंद्र सरकार व गैर-सिख लोगों के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया । सिख समुदाय निरंकारी मिशन को अधर्मी मानता था । सिखों का मानना था कि निरंकारी मिशन ने सिखी के नियमों को तोड़ा है । उनका कहना था कि सिखों के दस गुरुओं के अलावा कोई और गुरु नहीं हो सकता है ।

दसवें गुरु गुरु गोबिंद साहब ने गुरु पद को समाप्त कर गुरु ग्रंथ साहिब को हमेशा के लिए सिखों का गुरु घोषित कर दिया था लेकिन निरंकारी मिशन ने पुनः इस प्रथा को शुरू कर सिख धर्म का अपमान किया है । हालांकि यह विवाद इतना गहरा भी नहीं था लेकिन भिंडरावाले व अखंड कीर्तनी जत्था (बब्बर खालसा) के समर्थक सिखों ने इसे मामले को ओर अधिक विवादस्पद बना दिया । यही कारण था की भिंडरावाले के समर्थक कुछ सिख चरमपंथियों ने निरंकारी मिशन को लेकर अशांति फैलाने की कोशिश की । बब्बर खालसा का नेतृत्व बीबी अमरजीत कौर कर रही थी जो बाबा गुरुबचन सिंह के सुरक्षाकर्मी के हाथों मारे गए फौजा सिंह की पत्नी थी । बीबी अमरजीत कौर ने कई निरंकारियों की हत्या करवा दी व बाबा गुरुबचन सिंह पर पुनः हमला करने की कोशिश की । 24 अप्रैल 1980 को दिल्ली में एक कार्यक्रम को समाप्त कर बाबा गुरुबचन सिंह जब वापिस लौट रहे थे उसी दौरान अखंड कीर्ति जत्था के ही सदस्य रणजीत सिंह ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी । हालांकि चरमपंथियों की यह मानसिकता थी कि गुरुबचन सिंह की मृत्यु के बाद निरंकारी मिशन समाप्त हो जायेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं । बाबा गुरुबचन सिंह ने अपने अंतिम क्षणों में अपने बेटे हरदेव सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया । आज हर वर्ष 24 अप्रैल को निरंकारी मिशन के लोग मानव एकता दिवस के रूप में मनाते हैं ।

निरंकारी बाबा हरदेव सिंह

बाबा हरदेव सिंह का जन्म 23 फरवरी 1954 निरंकारी कॉलोनी दिल्ली में हुआ । बाबा हरदेव सिंह बाबा गुरुबचन सिंह व माता कुलवंत कौर के एकलौते पुत्र व अपनी चार बहनों के इकलौते भाई थे । बाबा हरदेव सिंह बचपन से ही बड़े दयालु व शांत स्वभाव के थे । यही कारण था कि उन्हें घर में सभी भोला कहकर पुकारते थे । परिवार व संगतों के सदाचार ने आपके जीवन मे संस्कार व संयम के बीज बोए ।

जैसा कि आपको ज्ञात है कि इनके पिता बाबा गुरुबचन सिंह निरंकारी मिशन के तीसरे गुरु थे । बाबा हरदेव सिंह निरंकारी मिशन के समागमों व कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते व यहां श्रद्धलुओं की सेवा करते ।

आपकी प्रारंभिक शिक्षा संत निरंकारी कालोनी दिल्ली के निकट रेडियो कालोनी में स्थित रोजरी पब्लिक स्कूल में हुई । इसके पश्चात 1963 में पटियाला के बोर्डिंग स्कूल यादविंद्र पब्लिक स्कूल में आपको दाखिला दिलाया गया । 1969 में माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के पश्चात आपने अपनी उच्च शिक्षा दिल्ली यूनिवर्सिटी से पूरी की ।

सांसारिक शिक्षा के साथ-साथ बाबाजी को माता कुलवंत कौर के पत्रों द्वारा आध्यात्मिक शिक्षा भी निरंतर मिलती रहती थी । उनके मिलनसार व करुणामय स्वभाव के कारण उन्हें शिक्षक व छात्र सभी बहुत पसंद करते थे । बाबा हरदेव सिंह को पर्वतारोहण का शौक था । वह कभी-कभी अपनी कक्षा के छात्रों तो कभी अकेले ही पर्वत की ऊंची-ऊंची चोटियों पर चढ़ जाते थे । इस शौक के कारण बाबा हरदेव सिंह के जीवन में धैर्य व दृढ़ता के गुण आये । हॉकी के जादूगर विश्व प्रसिद्ध ओलम्पिक खिलाड़ी 'श्री ध्यानचंद जी' से इन्होंने खेल की बारीकियां सीखीं । इसके अलावा फौटोग्राफी, ड्राइविंग व घुड़सवारी में इन्होंने प्रवीणता हासिल की । वे बड़ी ही सूक्ष्मता से शांत व चिरमुद्रा में प्रकृति को निहारते । वे सामाजिक व आध्यात्मिक गतिविधियों में निरंतर भाग लेते थे । 1971 ई. बाबा हरदेव सिंह ने निरंकारी सेवा दल की सदस्यता प्राप्त की और भक्तों की निस्वार्थ सेवा की । 14 नवम्बर 1975 को वार्षिक संत समागम के दौरान दिल्ली में फरूखाबाद के निरंकारी मिशन से जुड़े एक परिवार की सुंदर, सुशील और कर्मठ कन्या सविंदर कौर को अपना जीवन साथी बनाया । 1980 में अपने पिता गुरुबचन सिंह की हत्या के बाद 27 अप्रैल 1980 को बाबा हरदेव सिंह ने निरंकारी मिशन की कमान संभाली ।

निरंकारी मिशन की जिम्मेदारी संभालने के बाद बाबा हरदेव सिंह द्वारा मिशन के प्रचार-प्रसार की मुहिम को ओर तेज कर दिया गया । देश भर में हजारों नई शाखाएँ बनाई गईं व विदेशों में भी इस संदेश को तेजी से फैलाया गया । बाबा हरदेव सिंह भारत के हर छोटे-बड़े शहर में गए तथा अपने लाखों अनुयायियों को सत्य व अहिंसा व भाईचारे का संदेश दिया । आज दुनिया के लगभग 27 देशों में निरंकारी मिशन की सैंकड़ो शाखाएँ हैं ।

धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं

बाबा हरदेव सिंह की मानवता के प्रति सच्ची लगन व समर्पण से प्रभावित होकर लाखों लोग निरंकारी मिशन से जुड़ गए । इस मिशन में हिन्दू, मुस्लिम, सिख व ईसाई सभी धर्मों के लोग हैं । बाबा हरदेव सिंह का कहना था कि आज इंसान धर्म के नाम पर मरने-मारने पर उतारू हो गया है । वह धर्म के सही मायने ही भूल गया है । आज धर्म के नाम पर दिलों में दूरियाँ पैदा हो गई हैं । परमात्मा ने तो सभी को इंसान बनाकर भेजा, लेकिन आज कोई हिन्दू बन गया है तो कोई मुसलमान, कोई सिख बन गया तो कोई ईसाई । अपने सर्वोपरि धर्म इंसानियत को तो भूल ही गया है , होड़ लगी है तो बस अपने-अपने धर्म को बचाने की । धर्म की इस होड़ में इंसानियत कहीं पीछे रह गयी है ।

निरंकारी मिशन वर्षों से रक्तदान शिविर का आयोजन करता आ रहा है । देश-विदेश में लाखों निरंकारी अनुयायी रक्त दान करते हैं । बाबा हरदेव सिंह स्वंय रक्तदान करते थे । उन्हीं से प्रेरित होकर निरंकारी कैम्पों में एक दिन में 70000 यूनिट रक्तदान का सबसे बड़ा रिकॉर्ड बना । रक्तदान के इस रिकॉर्ड के चलते निरंकारी मिशन का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो गया ।

बाबा हरदेव सिंह ने मिशन व मानवता की सेवा में अपना पूरा जीवन लगा दिया । विदेशों में भी विभिन्न देशों में प्रतिवर्ष समागमों का आयोजन किया जाता है जहां प्रवचन देने के लिए बाबा हरदेव सिंह समय-समय पर जाते रहते थे । इसी सिलसिले में 25 अप्रैल 2016 को बाबा हरदेव सिंह दिल्ली से न्यूयॉर्क के लिए रवाना हुए । न्यूयॉर्क में अपना कार्यक्रम समाप्त करने के पश्चात वह कनाडा के लिए रवाना हुए । 13 मई 2016 को बाबा हरदेव सिंह कनाडा के शहर मॉन्ट्रियल जा रहे थे लेकिन रास्ते में ही बीहोरनिसस में उनकी कार अनियंत्रित होकर पल्ट गई । भारतीय समयानुसार यह हादसा शुक्रवार सुबह 5 बजकर 30 मिनट पर हुआ जबकि स्थानीय समयनुसार बृहस्पति शाम के साढ़े सात बजे थे । हादसे के वक्त कार में उनके दो दामाद संदीप खिंडा (सन्नी) व अवनीत सेतिया सहित कुल चार लोग सवार थे । हादसे के समय कार की गति लगभग 300 किमी./घंटा थी जिसे बाबाजी के बड़े दामाद सन्नी चला रहे थे । घायलों को अस्पताल ले जाया गया जहां बाबाजी व उनके दामाद अवनीत सेतिया को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया । इस प्रकार निरंकारी मिशन प्रमुख बाबा हरदेव सिंह हमेशा के लिए हमें छोड़कर चले गए लेकिन उनके लाखों अनुयायी आज भी उनके दिखाए मार्ग पर चल रहे हैं ।

माता सविंदर हरदेव

13 मई 2016 को बाबा हरदेव सिंह के ब्रह्मलीन होने के बाद निरंकारी मिशन की जिम्मेदारी उनकी पत्नी सविंदर हरदेव पर आ गई । सविंदर हरदेव निरंकारी मिशन की प्रथम महिला सतगुरु थीं । माता सविंदर हरदेव का जन्म 12 जनवरी 1957 रोहतक (हरियाणा) में पिता मनमोहन सिंह व माता अमृत कौर के घर हुआ । जन्म के कुछ समय पश्चात मनमोहन सिंह अपने परिवार के साथ यमुनानगर आ गए ततपश्चात वह फर्रुखाबाद जाकर बस गए । मनमोहन सिंह का परिवार शुरू से ही निरंकारी मिशन से जुड़ा हुआ था ।

माता सविंदर कौर की प्राम्भिक शिक्षा फर्रुखाबाद में ही हुई । प्राथमिक शिक्षा के पश्चात आपने माध्यमिक शिक्षा मसूरी हाईस्कूल से पास की । माता सविंदर हरदेव जी बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं । वे हर विषय में अच्छे अंक प्राप्त करती थीं । उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए आप दिल्ली आईं व यहां दौलत राम कॉलेज से आपने उच्च शिक्षा प्राप्त की । 14 नवम्बर 1975 को दिल्ली में आयोजित 28वें वार्षिक सन्त निरंकारी समागम के शुभारंभ से पहले बाबा हरदेव सिंह से आपका शुभ विवाह हुआ । इसी वर्ष आपने अपने हमसफर बाबा हरदेव सिंह, ससुर बाबा गुरुबचन सिंह व सास राजमाता कुलवंत कौर के साथ इटली, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, बेल्जियम व ऑस्ट्रिया की यात्राएं कीं तथा समागम में अपनीं सेवाएं दीं । इसके पश्चात आपने कुवैत, थाईलैंड, होंकोंग, ईराक, कनाडा, अमेरिका व ब्रिटेन की यात्रा की तथा निरंकारी मिशन के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

1980 में बाबा अवतार सिंह के बलिदान के बाद माता सविंदर हरदेव निरन्तर बाबा हरदेव सिंह के साथ देश-विदेश में आयोजित सत्संग व समागमों में भाग लेती थीं । 2016 में बाबा हरदेव सिंह के निधन के पश्चात निरंकारी मिशन की बागडोर माता सविंदर हरदेव ने संभाली । बाबा हरदेव सिंह के निधन के पश्चात माता सविंदर कौर अस्वस्थ रहने लगीं जिसके चलते वह मिशन की गतिविधियों में नियमित रूप से भाग नहीं ले पा रहीं थीं । माता सविंदर हरदेव ने हालातों को ध्यान में रखते हुए 16 जुलाई 2018 को एक आदेश जारी कर अपनी छोटी बेटी सुदीक्षा को सतगुरु बनाने की घोषणा की । 17 जुलाई 2018 को बहन सुदीक्षा ने 6ठे सतगुरु के रूप में निरंकारी मिशन की जिम्मेदारी संभाल ली । लंबी बीमारी के चलते 5 अगस्त 2018 को शाम 5 बजकर 5 मिनट पर माता सविंदर हरदेव का दिल्ली के बुराड़ी में स्थित निरंकारी कॉलोनी में निधन हो गया ।

बहिन सुदीक्षा

17 जुलाई 2018 को निरंकारी मिशन के छठे सतगुरु के रूप में बहिन सुदीक्षा ने पद संभाला । बहिन सुदीक्षा का जन्म 13 मार्च 1985 को दिल्ली में हुआ । सुदीक्षा बाबा हरदेव सिंह व माता सविंदर कौर की सबसे छोटी बेटी है ।

बहिन सुदीक्षा ने 2007 में एमिटी यूनिवर्सिटी से मनोविज्ञान में ग्रेजुएशन किया है । बहिन सुदीक्षा की शादी 2 जून 2015 में पंचकूला निवासी अवनीत सेतिया से हुई । अवनीत सेतिया बाबा हरदेव सिंह के साथ कनाडा के कार एक्सीडेंट में मारे गए थे ।

बाबाजी के निधन के बाद माता सविंदर हरदेव ने सुदीक्षा को सतगुरु का पद देना चाहा लेकिन परिवार के विरोध के कारण माता सविंदर हरदेव ने स्वयं निरंकारी मिशन की कमान संभाली । 16 जुलाई 2018 को माता सविंदर हरदेव ने अपने खराब स्वास्थ्य के चलते बेटी सुदीक्षा को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था । अपने पिता व पति को खो देने के बाद बहिन सुदीक्षा ने स्वयं को पूरी तरह मिशन की से समर्पित कर दिया । तब से वर्तमान में बहिन सुदीक्षा ही निरंकारी भक्तों का मार्गदर्शन कर रही हैं । बहिन सुदीक्षा की दूसरी शादी दिल्ली में 8 अगस्त 2017 को रमित चान्ना के साथ हुई । बहिन सुदीक्षा ने 24 से 26 नवंबर 2018 में आयोजित 71वें निरंकारी संत समागम में पहली बार एक सतगुरु के रूप में लाखों की संख्या में देश-विदेश से आये अनुयायियों को प्रवचन दिए ।


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