प्लूटो का इतिहास: ग्रह से बौना ग्रह बनने तक की पूरी कहानी
प्लूटो (Pluto) सौरमंडल के सबसे चर्चित खगोलीय पिंडों में से एक है। एक समय था जब इसे सौरमंडल का नौवाँ ग्रह माना जाता था, लेकिन वर्ष 2006 में अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने इसे ग्रहों की सूची से हटाकर बौना ग्रह (Dwarf Planet) घोषित कर दिया। इस निर्णय ने दुनिया भर में वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष प्रेमियों के बीच बड़ी चर्चा पैदा कर दी।
प्लूटो सूर्य से बहुत दूर स्थित एक ठंडा और रहस्यमय खगोलीय पिंड है। इसकी सतह पर बर्फ, पर्वत, मैदान और जमी हुई गैसें मौजूद हैं। आधुनिक अंतरिक्ष अभियानों ने यह साबित किया है कि प्लूटो पहले की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल और रोचक दुनिया है।
इस लेख में हम जानेंगे कि प्लूटो क्या है, इसकी खोज कब हुई, इसे ग्रह से बौना ग्रह क्यों बनाया गया और इससे जुड़े महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य क्या हैं।
प्लूटो क्या है?
प्लूटो सौरमंडल के बाहरी भाग में स्थित एक बौना ग्रह है।
यह काइपर बेल्ट (Kuiper Belt) नामक क्षेत्र में स्थित है, जहाँ लाखों बर्फीले और चट्टानी पिंड सूर्य की परिक्रमा करते हैं।
हालाँकि प्लूटो पृथ्वी के चंद्रमा से भी छोटा है, फिर भी इसकी अपनी जटिल भूगर्भीय संरचना और वातावरण है।
प्लूटो की खोज
प्लूटो की खोज 18 फरवरी 1930 को अमेरिकी खगोलशास्त्री क्लाइड टॉम्बॉ (Clyde Tombaugh) ने की थी।
इस खोज के बाद प्लूटो को सौरमंडल का नौवाँ ग्रह घोषित किया गया और लगभग 76 वर्षों तक इसे ग्रह के रूप में पढ़ाया जाता रहा।
प्लूटो का नाम कैसे रखा गया?
प्लूटो का नाम रोमन पौराणिक कथाओं के अधोलोक (Underworld) के देवता Pluto के नाम पर रखा गया।
दिलचस्प बात यह है कि यह नाम इंग्लैंड की 11 वर्षीय छात्रा वेनेशिया बर्नी ने सुझाया था।
प्लूटो ग्रह से बौना ग्रह क्यों बना?
वर्ष 2006 में अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने ग्रह की नई परिभाषा जारी की।
किसी खगोलीय पिंड को ग्रह कहलाने के लिए तीन शर्तें निर्धारित की गईं—
1. सूर्य की परिक्रमा करे
प्लूटो यह शर्त पूरी करता है।
2. उसका आकार गोल हो
प्लूटो यह शर्त भी पूरी करता है।
3. अपनी कक्षा के आसपास के क्षेत्र को साफ़ कर चुका हो
प्लूटो यह शर्त पूरी नहीं करता क्योंकि इसकी कक्षा में कई अन्य समान आकार के पिंड मौजूद हैं।
इसी कारण इसे ग्रह की श्रेणी से हटाकर बौना ग्रह (Dwarf Planet) घोषित कर दिया गया।
प्लूटो का निर्माण कैसे हुआ?
वैज्ञानिकों के अनुसार प्लूटो का निर्माण लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले सौरमंडल के निर्माण के दौरान हुआ था।
यह बर्फ, चट्टानों और जमी हुई गैसों से बना है। माना जाता है कि यह काइपर बेल्ट के अन्य पिंडों के साथ ही बना था।
प्लूटो की संरचना
प्लूटो की आंतरिक संरचना मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित मानी जाती है।
1. चट्टानी केंद्र
इसके केंद्र में चट्टानों से बना घना भाग मौजूद है।
2. बर्फीली परत
केंद्र के ऊपर जल-बर्फ की मोटी परत पाई जाती है।
3. सतही परत
सबसे बाहरी भाग में नाइट्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड की जमी हुई बर्फ मौजूद है।
प्लूटो की सतह कैसी है?
प्लूटो की सतह अपेक्षा से कहीं अधिक विविध है।
यहाँ पाए जाते हैं—
बर्फीले मैदान
ऊँचे पर्वत
गहरी घाटियाँ
जमी हुई गैसें
विशाल हिम क्षेत्र
इसकी सतह पर स्थित स्पुतनिक प्लैनिटिया (Sputnik Planitia) नामक क्षेत्र विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
प्लूटो का वातावरण
प्लूटो का वातावरण बहुत पतला है।
इसमें मुख्य रूप से—
नाइट्रोजन
मीथेन
कार्बन मोनोऑक्साइड
पाई जाती हैं।
जब प्लूटो सूर्य के थोड़ा निकट आता है तो सतह की कुछ बर्फ गैस में बदल जाती है और अस्थायी वातावरण बना देती है।
प्लूटो कितना ठंडा है?
प्लूटो सौरमंडल के सबसे ठंडे पिंडों में से एक है।
यहाँ औसत तापमान लगभग:
−229°C से −240°C
तक रहता है।
इतनी कम तापमान पर अधिकांश गैसें भी बर्फ के रूप में जम जाती हैं।
प्लूटो के चंद्रमा
प्लूटो के कुल 5 ज्ञात चंद्रमा हैं।
इनमें सबसे बड़ा चंद्रमा है:
कैरन (Charon)
कैरन इतना बड़ा है कि प्लूटो और कैरन को कभी-कभी "द्वि-पिंड प्रणाली" (Binary System) भी कहा जाता है।
अन्य चंद्रमा हैं—
Styx
Nix
Kerberos
Hydra
प्लूटो का एक दिन और एक वर्ष
प्लूटो का एक दिन लगभग:
6.4 पृथ्वी दिनों
के बराबर होता है।
जबकि सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में इसे लगभग:
248 पृथ्वी वर्ष
लगते हैं।
न्यू होराइजन्स मिशन
प्लूटो के अध्ययन में सबसे बड़ी सफलता NASA के New Horizons Mission से मिली।
यह अंतरिक्ष यान वर्ष 2015 में प्लूटो के पास पहुँचा और पहली बार इसकी नज़दीकी तस्वीरें भेजीं।
इस मिशन ने बताया कि—
प्लूटो सक्रिय दुनिया है।
इसकी सतह पर जटिल भूगर्भीय संरचनाएँ हैं।
यहाँ बर्फीले पर्वत मौजूद हैं।
इसका वातावरण अपेक्षा से अधिक जटिल है।
प्लूटो से जुड़े रोचक तथ्य
प्लूटो की खोज 1930 में हुई थी।
यह 2006 तक सौरमंडल का नौवाँ ग्रह माना जाता था।
अब इसे बौना ग्रह कहा जाता है।
यह काइपर बेल्ट में स्थित है।
इसके 5 ज्ञात चंद्रमा हैं।
इसका सबसे बड़ा चंद्रमा कैरन है।
एक वर्ष पूरा करने में इसे 248 पृथ्वी वर्ष लगते हैं।
क्या प्लूटो पर जीवन संभव है?
वर्तमान वैज्ञानिक जानकारी के अनुसार प्लूटो पर जीवन की संभावना अत्यंत कम मानी जाती है क्योंकि—
तापमान अत्यधिक कम है।
सूर्य का प्रकाश बहुत कम पहुँचता है।
वातावरण अत्यंत पतला है।
हालाँकि वैज्ञानिक अभी भी इसके आंतरिक भाग और संभावित भूमिगत संरचनाओं का अध्ययन कर रहे हैं।
प्लूटो का वैज्ञानिक महत्व
प्लूटो का अध्ययन वैज्ञानिकों को सौरमंडल के बाहरी क्षेत्रों, काइपर बेल्ट और ग्रहों के निर्माण को समझने में मदद करता है।
यह हमें यह भी सिखाता है कि विज्ञान में नई खोजों के आधार पर पुरानी धारणाएँ बदल सकती हैं।
निष्कर्ष
प्लूटो भले ही अब ग्रह न कहलाता हो, लेकिन इसका महत्व बिल्कुल भी कम नहीं हुआ है। यह सौरमंडल के सबसे रोचक और रहस्यमय पिंडों में से एक है। इसकी खोज, ग्रह से बौना ग्रह बनने की कहानी और New Horizons मिशन द्वारा भेजी गई अद्भुत तस्वीरों ने इसे विज्ञान की दुनिया में विशेष स्थान दिलाया है।
आज प्लूटो हमें सौरमंडल के दूरस्थ और कम ज्ञात क्षेत्रों को समझने का अवसर प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्लूटो ग्रह है या बौना ग्रह?
वर्तमान में प्लूटो को बौना ग्रह (Dwarf Planet) माना जाता है।
प्लूटो को ग्रहों की सूची से क्यों हटाया गया?
क्योंकि यह ग्रह की तीसरी शर्त यानी अपनी कक्षा को साफ़ करने की शर्त पूरी नहीं करता।
प्लूटो की खोज किसने की थी?
क्लाइड टॉम्बॉ ने 18 फरवरी 1930 को इसकी खोज की थी।
प्लूटो के कितने चंद्रमा हैं?
प्लूटो के 5 ज्ञात चंद्रमा हैं।
प्लूटो तक कौन-सा अंतरिक्ष यान पहुँचा था?
NASA का New Horizons मिशन 2015 में प्लूटो के पास पहुँचा था।
